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मराठ्यांच्या इतिहासाची साधने खंड एकोणीसावा (१७७९-१७८४)

पो। छ २३ गुरुवार                                                       लेखांक १९३.                                                     १७०३ भाद्रपद शु।। २.
सन इसन्ने समानीन.                                                         श्री.                                                               २१ आगष्ट १७८१.                                                                             

श्रीमंत राजश्री तात्यासाहेब स्वामींचे सेवेसीं:-
आज्ञांकित रामचंद्र गिरमाजी कृतानेक सां। नमस्कार विनंति विज्ञापना. येथील कुशल ता। भाद्रपद शु।। १२ द्वितीया भोमवासर मु॥ पुणें जाणोन स्वामींचे कृपाआवलोकनेकरून स्वस्ति क्षेम असों. विशेषः–श्रीमंत राजश्री रावजीपासीं आहों हें वर्तमान तर आपल्यास कळलेंच असेल. श्रीमंत आह्मांवर बहुत कृपा करितात. महाराजांस कळावें. महाराजास आमचेविसीं स्मरण असावें. सर्व प्रकारें आमचा सांभाळ करणार स्वामी समर्थ आहेत. मीं ल्याहावें ऐसें नाहीं. विशेष काय लिहिणें, कृपालोभाची वृद्धी करणार आपण समर्थ आहां हे विज्ञप्ति.

राजश्री बाळाजीपंत भावोजी स्वामीस सां। नमस्कार विनंति जे, घरचें वगैरे वर्तमान ल्याहावें तर आदियाद आह्मांसच कांहीं कळत नाहीं. श्रावणमासीं तीर्थरूप राजश्री नानांकडील पत्र आलें, त्यांत कांहीं मजकूर नाहीं. त्यांनीं लिहिलें कीं, आपणच पुण्यास आमचे भेटीकरितां येतों. त्यास तीर्थरूप आल्यानंतर काय वर्तमान कळेल तें कळेल. तदनंतर मी आपणांस लेहून पाठवीन. माझें वर्तमान आपल्यास कळलेंच असेल. श्रीमंत राजश्री रावजी आह्मांवर बहुत कृपा करतात. आह्मांविसीं आपल्यास स्मरण असावें. श्रीमंत राजश्री तात्यासाहेबांस विनंति करून एक असामीची सोय करून घ्यावी. आपण तर करतील. परंतु सूचनार्थ लिहिलें आहे. सर्वप्रकारें मी लेंकरूं आहे. आपण वडील आहांत. आपल्यास कांहीं वारंवार ल्याहावें, हा पदार्थ नाहीं. सदैव पत्रीं संतोषवित असावें. विशेष काय लिहिणें, कृपावृद्धी करीत जावी हे विनंति.